
मसूरी। दो सितंबर 1994 उत्तराखंड के इतिहास का वह काला दिन है, जब अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान मसूरी में पुलिस फायरिंग हुई थी। इस गोलीकांड में छह आंदोलनकारी और डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की मौत हुई थी। हर वर्ष इस दिन शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बाद भी उनके सपनों और आंदोलन के मुद्दों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
खटीमा गोलीकांड के बाद मसूरी में बढ़ा आक्रोश
एक सितंबर 1994 को खटीमा में हुई पुलिस फायरिंग की खबर मसूरी पहुंचने के बाद आंदोलनकारियों में आक्रोश फैल गया था। उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति ने मसूरी बंद का आह्वान किया और आंदोलनकारियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू किया।
हालात तनावपूर्ण होने के बाद 46 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इनमें संघर्ष समिति के तत्कालीन अध्यक्ष हुक्म सिंह पंवार भी शामिल थे।
दो सितंबर को हुआ था मसूरी गोलीकांड
दो सितंबर को झूलाघर क्षेत्र में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तनाव बढ़ गया। देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई और पुलिस फायरिंग में छह आंदोलनकारी बलिदान हो गए।
इस गोलीकांड में राय सिंह बंगारी, मदन मोहन ममगाईं, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, बलबीर नेगी और धनपत सिंह ने जान गंवाई। वहीं, डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की भी मौत हुई।
घटना के बाद पूरे पहाड़ में आक्रोश फैल गया और मसूरी, देहरादून समेत अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में राज्य आंदोलन और तेज हो गया।
2000 में बना उत्तराखंड, लेकिन क्या पूरे हुए सपने?
लंबे संघर्ष और आंदोलनकारियों के बलिदान के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि पहाड़ के लोगों की समस्याओं का समाधान होगा और आंदोलन के दौरान उठाए गए मुद्दों पर ठोस काम किया जाएगा।
लेकिन आज भी आंदोलनकारी कई मूल मुद्दों को अधूरा मानते हैं।
मसूरी शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष भगवान सिंह धनाई ने शहीदों के नाम पर सड़कों और म्यूजियम बनाने की घोषणाओं पर अमल नहीं होने पर चिंता जताई। उनका कहना है कि शहीद स्थल पर शेड निर्माण की मांग भी अभी लंबित है।
गैरसैंण, पलायन और भू-कानून पर भी सवाल
उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के तत्कालीन महामंत्री जयप्रकाश उत्तराखंडी का कहना है कि भ्रष्टाचार, भूमाफिया और बाहरी उद्योगपतियों के प्रभाव ने राज्य आंदोलन के मूल सपनों को पीछे धकेल दिया है।
उनके मुताबिक गैरसैंण राजधानी, पलायन, मूल निवास और भू-कानून जैसे मुद्दे आज भी गंभीर बने हुए हैं।
डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की पत्नी की आखिरी इच्छा
मसूरी गोलीकांड में बलिदान हुए डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की पत्नी जसोदा त्रिपाठी आज भी अपने पति को उत्तराखंड सरकार की ओर से शहीद का दर्जा मिलने की उम्मीद लगाए बैठी हैं।
68 वर्षीय जसोदा त्रिपाठी का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके पति को शहीद का दर्जा दिया था, लेकिन उत्तराखंड सरकार की ओर से अभी तक ऐसा नहीं किया गया।
उनकी इच्छा है कि उनके पति को उत्तराखंड में शहीद का दर्जा मिले और मसूरी या देहरादून में उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए। उनका कहना है कि उन्हें किसी आर्थिक मदद की जरूरत नहीं है, बल्कि वह केवल अपने पति के सम्मान की मांग कर रही हैं।
32 साल बाद भी सवाल कायम
मसूरी गोलीकांड की बरसी पर हर साल शहीदों को याद किया जाता है। श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके बलिदान को नमन किया जाता है। लेकिन तीन दशक से अधिक समय बाद भी आंदोलनकारियों और शहीद परिवारों की कई मांगें सामने हैं।
अब सवाल यह है—
क्या राज्य आंदोलन के शहीदों के सभी सपने पूरे हो पाए हैं?
शहीदों के नाम पर प्रस्तावित सड़क और म्यूजियम की योजनाएं अब तक क्यों लंबित हैं?
शहीद स्थल पर शेड निर्माण की मांग कब पूरी होगी?
डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी को उत्तराखंड में शहीद का दर्जा कब मिलेगा?
गैरसैंण, पलायन, मूल निवास और भू-कानून जैसे आंदोलन के मूल मुद्दों का स्थायी समाधान कब होगा?
क्या आने वाली पीढ़ियां राज्य आंदोलन के बलिदान और उसके मूल उद्देश्यों को उसी भावना से याद कर पाएंगी?
मसूरी गोलीकांड केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्ष और बलिदान की ऐसी स्मृति है, जो आज भी राज्य के सामने कई अनुत्तरित सवाल छोड़ती है।
