
उत्तराखंड में छात्रसंघ चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं और अब इन नतीजों को लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने दावे कर रहे हैं। एक तरफ भाजपा ABVP के प्रदर्शन को युवाओं के बीच अपनी विचारधारा के समर्थन से जोड़ रही है, तो कांग्रेस का दावा है कि पहाड़ से मैदान तक NSUI ने बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन इन दावों के बीच छात्रसंघ चुनाव के वास्तविक नतीजे क्या कहते हैं और क्या कॉलेज परिसरों का ये मूड 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए कोई संकेत देता है?
29 सितंबर को हुए छात्रसंघ चुनाव में तस्वीर कॉलेज-दर-कॉलेज अलग रही। गढ़वाल के 55 डिग्री कॉलेजों में अध्यक्ष पद पर ABVP के 23, NSUI के 17 और अन्य प्रत्याशियों के 15 खाते में गए। कुमाऊं में भी मुकाबला एकतरफा नहीं रहा। नैनीताल के DSB और हल्द्वानी के MBPG कॉलेज में निर्दलीय प्रत्याशियों ने अध्यक्ष पद जीता। देहरादून में DAV और MKP में ABVP को अध्यक्ष पद मिला, जबकि DBS में NSUI का अध्यक्ष चुने गया। रुड़की के KLDAV में NSUI ने अध्यक्ष समेत चार प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। यानी नतीजों में दोनों छात्र संगठनों की मौजूदगी दिखाई दी, साथ ही कई जगह निर्दलीय प्रत्याशी भी निर्णायक रहे।
छात्रसंघ के नतीजों को लेकर कांग्रेस का कहना है कि पहाड़ से मैदान तक कई जगह NSUI के प्रत्याशी जीते हैं और इसे पार्टी राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ से जोड़ रही है। कांग्रेस ने DAV PG कॉलेज की मतगणना को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
वहीं भाजपा भी इन नतीजों को अलग नजरिए से देख रही है। भाजपा का कहना है कि जिस बदलाव की बात विपक्ष चुनाव से पहले कर रहा था, छात्रसंघ चुनाव के नतीजों में उसका असर दिखाई नहीं दिया।भाजपा का दावा है कि युवाओं के बीच राष्ट्रवादी विचारधारा और ABVP की स्वीकार्यता चुनाव परिणामों में दिखाई दी है और इसे आने वाले विधानसभा चुनाव के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है।
छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने फिलहाल दोनों दलों को अपने-अपने दावे करने का मौका जरूर दिया है। कांग्रेस इसे युवाओं के बीच NSUI की पकड़ से जोड़ रही है, तो भाजपा ABVP के प्रदर्शन को अपने पक्ष में छात्र राजनीति के रुझान के तौर पर देख रही है। लेकिन कॉलेज परिसरों के नतीजे एक जैसी तस्वीर नहीं दिखाते। कहीं ABVP, कहीं NSUI और कई जगह निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। ऐसे में इन नतीजों को 2027 का सीधा संकेत मानना जल्दबाजी होगी। हां, इतना जरूर है कि छात्रसंघ चुनाव ने उत्तराखंड की युवा राजनीति में दोनों दलों के लिए अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने की चुनौती सामने रख दी है।

