
आज उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने को है और उत्तराखण्ड अपनी स्थापना की रजत जयन्ती ( सिल्वर जुबली ) मना रहा है ।
उत्तराखण्ड 25 वर्ष का युवा हो चुका है । जहां सत्ता पक्ष अपनी सफलताएं गिना रहा है । वहीं विपक्ष भी इसमें खामी निकालने की कोई कसर नही छोड़ रहा ।
खैर नेता लोगों का पक्ष -विपक्ष चलता रहेगा
गढ़वाली में कहावत है कि ” अपड़ि बै तैं क्व बोदु डैण ” अर्थात् अपनी कमी कोई दल नही बताएगा
कांग्रेस भाजपा पर अपनी कमियों का आरोप मढेगी और कांग्रेस भाजपा पर ।
खैर आज यह विश्लेषण करने की आवश्यकता है कि जो संघर्ष उत्तराखण्ड के आम जनमानस ने उत्तराखण्ड को पाने लिए किया था । और कहा गया था कि लखनऊ से पहाड़ों का विकास नहीं हो सकता ।
उत्तराखंड कि अर्थव्यवस्था को मनीआर्डर अर्थ व्यवस्था के रूप में जाना जाता है ।
सन् 2000 से पहले उत्तराखण्ड उत्तरप्रदेश राज्य का हिस्सा था व दो मण्डलों के रूप में था। गढ़वाल और कुमाऊं मण्डल ।
जो मण्डल आज भी विद्यमान हैं । और वर्तमान में 13 जिले हैं ।
उत्तराखण्ड की मांग बार- बार उठती रही ।
व उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर छोटे मोटे आन्दोलन होते रहे व उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर 1979 को मसूरी में हुई थी। इस दल की स्थापना डॉ. डी.डी. पंत की अध्यक्षता में हुई थी, जो कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे। उत्तराखंड क्रान्ति दल का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड को एक अलग राज्य बनाना था, जहां स्थानीय जनता द्वारा शासन किया जा सके और पर्वतीय जनजीवन, संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक न्याय की रक्षा की जा सके ।
पर उत्तराखण्ड क्रान्ति दल भी
इसके बाद उत्तराखण्ड क्रान्ति दल क्षेत्रीय हितों को लेकर अपनी आवाज बुलन्द करता रहा ।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को अपने घोषणा पत्र में 1991 के चुनावों में पहली बार शामिल किया था। इसके अलावा, 1987 में अल्मोड़ा के पार्टी सम्मेलन में भी भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग को स्वीकार किया था ।
पर 9 नवम्बर 2000 के बाद जब उत्तराखंड राज्य की स्थापना हुई उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने संघठन की मजबूती पर कोई बल नही दिया । व सत्ता कमेः आने के शार्टकट तरीके अपनाता रहा ।कभी भाजपा से गठबन्धन के जुगत में रहे तो कभी कांग्रेस से गठबन्धन की जुगाड़ में ।
उत्तराखण्ड बनने के बाद उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के पहले चार विधायक फिर 3 विधायक फिर 1 ही आये फिर शून्य । उत्तराखण्ड क्रान्ति दल यही सपने देखता कि कब त्रिशंकु विधानसभा उत्तराखण्ड में और अल्पमत की सरकार आये जिससे राज्य मन्त्री या कैबिनेट मन्त्री बनने का जुगाड हो जाये । पर संगठन की मजबूती पर कोई ध्यान नहीं दिया । किसी हद् तक यूकेडी को यह तात्कालिक व व्यक्तिगत लाभ भी मिला व पहले दिवाकर भट्ट भाजपा सरकार में कैबिनेट मन्त्री बने व कांग्रेस सरकार में प्रीतम सिंह पंवार कैबिनेट मन्त्री बने पर उत्तराखंड क्रान्ति दल संघठन के आधार पर शून्य हो गया । आज स्थिति यह है कि एकमात्र क्षेत्रीय दल का एक भी विधायक नहीं है । कई नेता भाजपा या कांग्रेस मे सम्मिलित हो गये
इसके बाद इन्द्रमणी बडोनी फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट काशी सिंह ऐरी त्रिवेन्द्र पंवार आदि ने संघठन को आगे बढ़ाया । उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर आन्दोलन में उबाल 1994 में आया । इसके पीछे कारण कुछ और थे पर यह आन्दोलन उत्तराखण्ड राज्य की मांग में तब्दील हो गया । केन्द्र में राष्ट्रीय मोर्चा जनता दल के नेतृत्व में बी पी सिंह की सरकार थी ।
जिसे भाजपा का समर्थन प्राप्त था । भाजपा ने 1992 में राम मंदिर आन्दोलन शुरू कर दिया तो उधर से वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को को लागू कर दिया जोकि विगत कांग्रेस की सरकारों ने ठंडे बस्ते में डाल रखा था।
मंडल अयोग में अति पिछड़ा वर्ग हेतु (OBC) हेतु 27% आरक्षण की शिफारिश की गई थी ।
जिससे भारत वर्ष के देश भर में शिक्षित युवाओं
और बेरोजगारों ने बहुत बड़ा छात्र आन्दोलन खड़ा कर दिया । देशभर के कई राज्यों में आरक्षण के विरोध में आत्महत्या और आत्मदाह जैसे आत्मघाती कदम उठाने लगे ।
जिससे वी पी सिंह की अल्पमत सरकार लडखडा गयी और गिर गई । कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चन्द्रशेखर की सरकार बनी और चन्द्रशेखर के नेतृत्व में समाजवादी जनता पार्टी की सरकार बनी । और यूपी मुलायम सिंह के नेतृत्व में राज्य सरकार बनी और केन्द्र में कांग्रेस के समर्थन वापसी पर चन्द्रशेखर सरकार गिर गई और मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी का नाम समाजवादी जनता पार्टी से समाजवादी रख दिया । जिसे चुनाव आयोग ने भी मान्यता दे दी । इसके बाद काशीराम के नेतृत्व वाली बहुजन समाजवादी पार्टी ( बसपा) और मुलायम यादव के नेतृत्व वाली सपा का गठबन्धन हुआ
और सपा – बसपा गठबन्धन ने मिलकर यूपी में चुनाव लड़ा और सपा बसपा के गठबन्धन की सरकार बन गई । डाई- ढाई वर्ष का यह अनुबन्ध हुआ कि ढाई वर्ष सपा व ढाई वर्ष बसपा का मुख्यमन्त्री रहेगा ।
पहले डाई वर्ष में मुलायम सिंह मुख्यमन्त्री बने ।
मुलायम फिंह यादव ने अपने कार्यकाल के मण्डल आयोग की शिफारिश ( 27%आरक्षण पिछड़े वर्ग हेतु )लागू कर दी। जिससे एक बार फिर उत्तरप्रदेश में आरक्षण के विरोध में आन्दोलन शुरू हो गया । अविभाजित उत्तरप्रदेश में आन्दोलन तो आरक्षण के विरोध में था पर यह धीरे- धीरे यह आन्दोलन पर्वतीय जिलों ( वर्तमान उत्तराखण्ड के पहाड़ी जिलों में उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में परिवर्तित हो गया ।
इसमें पहले पहल छात्र युवाओं द्वारा हुआ। धीरे धीरे इसमें उत्तराखण्ड क्रान्ति दल और अन्य दल जुड़ते चले गये । और यह उत्तराखण्ड का स्वतः स्फूर्त व बिशुद्ध गैर राजनीतिक आन्दोलन था ।
और दलगत आस्थाओं व भावनाओं से परे था।
इस आन्दोलन मे कि सी भी राजनीतिक दल का झण्डा डंण्डा या बैनर नहीं था ।
इसमें बस यही एक आवाज थी-
“आज दो अभी दो उत्तराखण्ड राज दो”
“एक ही नारा एक ही जंग ले के रहेंगे उत्तराखण्ड”
“कोदा झंगोरा खायेंगे उत्तराखण्ड बनाएंगे” । मैं उस समय राजकीय कीर्ति इण्टरमीडिएट कालेज उत्तरकाशी में पढ़ता था । पहले पहल जब छात्र आन्दोलन से उत्तराखण्ड आन्दोलन शुरू हुआ हमने ही राजकिय कीर्ति इण्टरमीडिएट कालेज से जाकर रा.स्ना.महाविद्यालय उत्तरकाशी के गेट पर चूड़ियां लटकायी थी । और जो” नही है साथ में
चूड़ी पहनो हाथ में” जैसे नारे लगाकर डिग्री कालेज के छात्र छात्राओं को जागरुक किया था । इन्द्रेश मैखुरी ,रामचन्द्र नौटियाल व अन्य छात्र छात्राएं भी इसमें इण्टरमीडिएट कालेज से
उत्तराखण्ड आन्दोलन का नेतृत्वकारी थे ।
तब जाकर हमारे साथ डिग्री कालेज उत्तरकाशी के छात्र छात्राएं उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर इस जुलूस में सम्मिलित हुए ।
6 अगस्त व 9 अगस्त 1994 को पौडी में पृथक्क राज्य की मांग को लेकर आन्दोलन कर रहे जन सैलाब पर लाठीचार्ज हुआ । फिर इससे भी बडा प्रदर्शन खटीमा में 1 सितम्बर 1994 व 2 सितम्बर 1994 को मसूरी में हुआ। यहां तत्कालीन मुलायम सरकार ने लाठीचार्ज करवाया व पहाडी जिलों में मुलायम सिंह यादव की एक खलनायक की छवि बन गयी ।मुलायम सिंह यादव सरकार ने उत्तराखण्ड को लेकर कौशिक समिति गठित की ।
फिर 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली जा रहे निहत्थे आन्दोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर में रामपुर तिराहा में मुलायम सरकार ने लाठीचार्ज करवाया जिसकी राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा फैल गयी व तीव्र आलोचना हुई अगले दिन 3 अक्टूबर 1994 के सुबह समाचार पत्र पत्रिकाओं में यह लाठीचार्ज सुर्खियां व चर्चा का विषय बन गया । क्योंकि इसमे लाठीचार्ज के साथ साथ उत्तराखण्ड की भोली भाली जनता का बाथ अभद्रता व अमानवीय व्यवहार किया गया । केन्द्र मे इस समय कांग्रेस नीत नरसिम्हाराव की सरकार थी । मुलायम सिंह यादव सरकार को बर्खास्त करने की मांग की गई ।
राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की गई पर केन्द्र की कांग्रेस की सरकार ने एक भी न सुनी । मुलायम सरकार को मौन समर्थन दिया ।
इस तरह से मुजफ्फरनगर काण्ड के बाद उत्तराखंड आन्दोलन एक राष्ट्रीय मुद्दा व चर्चा का विषय बन गया । संसद मे भी इस पर चर्चा
हुई ।
भाजपा सांसद खण्डूडी व आडवाणी तथा अटल जी ने संसद में यह मुद्दा उठाया और कहा कि उत्तराखण्ड आक्रोश में है ।और आन्दोलन की आग से झुलस रहा है ।
केन्द्र सरकार इसके समाधान का कुछ हल निकाले ।
इसके बाद जब उत्तराखंड राज्य आन्दोलन अपने चरम पर आया तो कर्मचारी वर्ग भी
अपनी रोजी’रोटी व नौकरी की परवाह न करते हुए उत्तराखंड आन्दोलन में कूद पड़ा ।
इस जनान्दोलन में क्या बच्चा ?
क्या बूढ़ा ?क्या युवा ? क्या महिला ? क्या कर्मचारी सबके सब इस जनान्दोलन कूद पड़े
इतना बड़ा जनान्दोलन शायद उत्तराखंड व भारत व उत्तराखण्ड के इतिहास में पहले भी कभी हुआ हो ?
ऐसे तथ्य उपलब्ध नहीं हैं।
इसके बाद उत्तराखंड राज्य से सम्बन्धित छुटपुट आन्दोलन होते रहे
======================= उत्तराखण्ड राज्य गठन की प्रक्रिया – संक्षिप्त विवरण
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उत्तराखण्ड (पहले “उत्तरांचल”) का एक लंबी सामाजिक‑राजनीतिक आंदोलन,कई समितियों और संसद के दो सदनों में पारित विधेयक के बाद हुआ। नीचे प्रमुख चरणों का क्रमवार विवरण दिया गया है।
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1. आंदोलन की शुरुआत (1990‑1994)
– *1990‑91:* उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन का पुनरुत्थान हुआ। विभिन्न छात्र, युवा और सामाजिक संगठनों ने “उत्तरांचल” की मांग को तेज़ किया।
– *6‑9 अगस्त 1994:* मुजफ्फरनगर (उप्र) में आंदोलनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी हुई, जिससे कई लोग शहीद हुए। इस घटना ने आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिलाया।
2. राजनीतिक दबाव और समितियों का गठन
– *1995:* उत्तर प्रदेश सरकार ने “उत्तरी प्रदेश पुनर्गठन समिति” (जिसे अक्सर “रॉली समिति” कहा जाता है) का गठन किया, जिसने उत्तराखण्ड के विभाजन के पक्ष‑विपक्ष पर रिपोर्ट तैयार की।
– *1996:* भारत के प्रधानमंत्री *एच. डी. देवगौडा* ने 8 जुलाई 1996 को “उत्तरांचल, झारखंड और छत्तीसगढ़” के निर्माण की घोषणा की। यह घोषणा संसद में प्रस्तुत करने के लिए एक औपचारिक कदम थी।
3. विधेयक का प्रारूप और संसद में परिचय
– *1998‑99:* उत्तर प्रदेश सरकार ने “उत्तरी प्रदेश पुनर्गठन विधेयक, 1998” तैयार किया।
– *22 जुलाई 1999:* लोकसभा में विधेयक पेश हुआ। बहस के दौरान कई सांसदों ने उत्तराखण्ड के भू‑सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों को उजागर किया।
4. संसद के दोनों सदनों में पारित होना
– *लोकसभा:* 1 अगस्त 2000 को विधेयक को ध्वनि मत से पारित किया गया।
– *राज्यसभा:* 10 अगस्त 2000 को राज्यसभा ने भी विधेयक को मंजूरी दी।
5. राष्ट्रपति की स्वीकृति
– *28 अगस्त 2000:* राष्ट्रपति *आर. नारायणन* ने विधेयक पर हस्ताक्षर किए।
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इसके बाद लम्बे संघर्ष के फलस्वरूप उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना हुई ।
आज हमें मनन व चिन्तन करने की आवश्यकता है जिन उद्देश्य को लेकर पृथक्क उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना क्या वह उद्देश्य पूरा हो पा रहा है?
जो सपने उत्तराखण्ड के शहीदो ने देखे थे
च्या वे पूरे हो पा रहे हैं ?
क्या उत्तराखण्ड अपनी संस्कृति व पलायन को बचा पा रहा है ?
क्या हमारी स्थानीय भाषाओं गढ़वाली और कुमाऊंनी जौनसारी व अन्य स्थानीय भातृभाषाओं का विकास हो पा रहा है ?
क्या पर्यटन रोजगार से जुड पा रहा है
क्या स्थानीय जन को रोजगार मिल पा रहा है?
क्या पलायन की गति रुक पा रही है ?
क्या पहाड़ो में उद्योग स्थापित हो पा रहे हैं
भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पा रहा है।
नकल माफियाओं पर सरकार शिक॔जा कसने में सफल हो पा रही है ?
मूल निवास व भू- कानून पर इन 25 वर्षों मे किसी भी सरकार ने आज तक ठोस कदम क्यों नहीं उठाया ?
पर्यटक स्थलों व धार्मिक स्थलों को विकसित किया जा रहा है कि नहीं? क्योंकि पर्यटन ही उत्तराखण्ड में रोजगार का एक महत्वपूर्ण श्रोत है ।
क्या खोया ?
क्या पाया?
इस पर विचार करें अभी
क्या हुआ ?
इसे मनन करें सभी ।
आप सभी उत्तराखण्डवासियों को
उत्तराखण्ड राज्य स्थापना की रजत जयन्ती वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
– रामचन्द्र नौटियाल
शिक्षक कवि व साहित्यकार
उत्तरकाशी उत्तराखण्ड
सम्पर्क- 9997976276

